शुक्रवार, 18 नवंबर 2011

MAJDOOR

एक दिन देखा एक मजदूर को
देखकर सोचा उस मजदूर को
लोग करते है क्यों घृणा
देखकर मजदूर को


जबकि मजदूर के बने घर हम रहते है
वे मजदूर पूरा दिन धुप में तपते है
उन्ही के कारण हम आराम  से
सांस लेते है
पर वे बेचारे गर्मी से हाफ्ते है



खून पसीना एक कर
भर न पाते पेट को
फिर भी न जाने क्यों लोग
  
घृणा से देखते है मजदूर को  



मजदूर तो मजदूर है
पर अपनी आदत से भी मजबूर है
अपनी इच्छाओं को करना दफ़न
सायद बेबसी है मजदूर की


 मजदूर की मजबूरी का
फायदा उठाना रस है
जो आजकल के सभी सभ्यों
के बस में है


उनके पेट को काटकर
लोग भरते अपने पेट को
और शायद इसीलिए लोग
घृणा करते नही मजदूर से

शुक्रवार, 11 नवंबर 2011

budhaapa

बुढापे में मनुष्य
हो जाता है नाम रुई के समान
 उम्र बढ़ते बढ़ते वह
परिवार पर हो जाता बोझ के समान


श्रवण कुमार जैसे पुत्रो का जन्म
अब माता पिता के लिए सपना है
आजकल के पुत्रो में
केवल धन ही अपना है


पैदा होने के बाद ही
शुरू होता क्रम उपकार भूलने का
भूल जाते है की माता पिता
जिन्होंने उन्हें बचपन में पाला
अब वे सायद खुद ,उनसे
वही आकांछा रखते है
पर ये तो केवल वृद्ध सेवा का
झूठा दंभ भरते है


आज के भागम दौर जिन्दगी में
भूल जाते है लोग जन्म दाता को
ये भी भूल जाते है की
इन्ही वृद्धो के कारन ही
धरा पर इनका जीवन संभव है



पर आज कल के परिवार में
नये वृद्धो का पालना असम्भव है


भले ही बुढापे भर बुधो को
रखा जाए भूखा प्यासा
चीथड़े वस्त्र बढाए
उनकी शोभा


पर उनके मरने के बाद
लोग रोने का झूठा ढोंग करते है
जिन्दा रहते भले ही तरश गये हो फलो को
पर मरने के बाद उनके
लोग बांटे फिरते है फलो को


जीवित रहते उनके ,उनसे भले ही
न की हो प्यार से दो बात
पर
चित्र टांगते है दीवार पर उनका
  उनके मरने के बाद



और
यदा कदा उस चित्र को
फूलो से सजाकर
कुछ धुपबत्तियाँ दिखाकर
लोग करते है एक बड़ा दिखावा



रविवार, 6 नवंबर 2011

ek ehsaas

दिल के दरवाजे पर दे दस्तक 
जब उन्होंने बुलाया था
याद आता है वो दिन
दिल भी ये मुस्कुराया था

जाना था पहली बार 
इस मीठे एहसास को   
जब सुना था मैंने 
उनकी मधुर आवाज को

तबसे तो मेरी दुनिया
है एकदम ही बदल गयी
 ये धरती भी दिखती है
सजी सवारी नयी नयी

नदियों की कल; कल 
जो पहले न तनिक थी लुभाती
आज वही आवाज दिल में
खुशियों की बरसात कराती

गमो की छाया भी अब 
जीवन में न रही

 
याद आती है वो बाते जो 
जो थी कही या अनकही

हर खिले फूल में 
वही चेहरा नजर आता है
गुनगुनाने वाला भौरा भी
उनकी कहानी कह जाता है

अब जाकर ये समझा ये 
बंधन कितना प्यारा है
बंध जाना भी जिसमे 
लगता इतना प्यारा है




  
 


  





मंगलवार, 1 नवंबर 2011

kab

आज के इस दौर में
न जाने
कब भरेगा गरीबो का पेट

पुरे होंगे सपने उनके 
कब होगा
खुशियों से भेट

कूड़ा बीनते बच्चे 
कब जायेंगे इस्कूल     
आगे बढ़ने के लिए पढेंगे
कब जायेंगे
विपदा भूल

कब कोई गरीब
प्रेयसी को
पहना सकेगा फूलो का हार 
हँसता चेहरा देख कर
कब पा सकेगा खुशिया अपार 

कब बनेंगे आशियाने खुद के 
नापेंगे वो गगन को
उड़ के

कब तलक अमीर गरीब के 
बीच की मिटेगी खाई
दूर होंगे भेद सारे
कब होंगे सब लोग भाई भाई  
       

सोमवार, 31 अक्टूबर 2011

dekha

प्रकाश पर्व के मौके पर
रौशनी को मरते देखा
सत्ता के लिए सत्ताधीशो को
तू-तू- मै-मै करते देखा


खफा हो गयी लक्ष्मी भी हमसे
उन्हें भी
जालसाजो की जेब भरते देखा

जो डूबा सो पार हुआ
भ्रस्टाचार की दरिया में
नेक नियति हलाल हो गयी जिसमे
ऐसी गंगा बहते देखा     



 

सोमवार, 1 अगस्त 2011

HAM HAI SARKAAR

हम है सरकार
नहीं किसी के विचारों
की
है हमे दरकार

जो मेरे साथ साथ चले
बस वही साथी है
मुझसे उलट चलने की सजा
गोली और लाठी है

जो जी में आएगा
हम वही करेंगे
लूटेंगे इस देश को
साथियो के घर भरेंगे

लूट डकैती भ्रस्ताचार
ये सब है मेरे सहचर
अनीति,बेशर्मी का हमने
प्रभु से
माँगा है वरदान कहकर

भूल के भी मेरे खिलाफ
कोई बात न कहना
सुन लो
जो हम कहे वही नियम है
इन बातो को हृदय में बुन   लो


कहने को नक्सलवाद ,भाई भतीजावाद
हम मिटाते है
पर परोपकार के चलते
फिर से इन्हे जिलाते है

खत्म होगा हर विचार
खिलाफत करेगा जो हमारी
मत आना सामने कभी
आखिर
क्या औकात है तुम्हारी

पक्ष विपक्ष हम भाई भाई
इधर न देखो
तुम हो aam  जन
मनमर्जी करने दो हमको
नहीं तो
लाठिया पड़ेंगी दनादन

गरीबो को मिटाकर करेंगे
अमीरों से प्यार
क्युकी
हम है सरकार
नहीं किसी के विचारों की
है हमे दरकार

रविवार, 31 जुलाई 2011

NA AAYA SAAWN

ES BAAR सावन नहीं
आया
कैसी है प्रकृति की
माया

ना घिरे आसमान में
काले काले मनोहारी बादल
इस साल कोई मयूर भी
न हुआ ख़ुशी से पागल

तरश गए कित्नोके
 तन मन
न बारिश हुई ना
प्याश बुझी

कोयलों की है कुंके
गायब
दिख रही धरती
सुखी सुखी

कवियो की कविताएं
रुकी
ना डालिया फलो
से झुकी

क्यों हो रहा ऐसा
कुछ समझ न आ रहा
क्या सावन का सुखद मौषम
इस धरा से जा रहा

अब कैसे फूटेंगी
वृक्षों में
नयी नयी कोपले
जब सावन ही ना रहेगा
कैसे होंगी प्रेमी दिलो में
प्यार भरी वो हलचले

EK YAAD

गरज गरज के सावन
बरसा
उनसे मिलने को हृदय
तरशा

नभ में चमक उठे जो
बादल
उनके दीदार को हुआ
 पागल

वह दीपशिखा सी
तन्वंगी वह
दूर क्यों हमसे बैठी है
हृदय हमारा,जिनके हृदय का
वर्षो पुराना कैदी है

बूंद जो गिरती है
तन पर
सुध बुध ही खो देता हु
उनसे मिलने की आस लिए
खुली आँखों से सो लेता हु

13/7 hamalo ke baad

एक बार हुए फिर धमाके
dahala pura desh
आतंक ne kai jaane le li
mach gaya ghr ghr klesh

netaao ne taale thoki
karne ko eska paradafash
par aam jan ka hriday fat gaya 
dekh आतंक ka nanga naach

kahane ko to kbhi
thamta नहीं ये सहर
par ab kya bekhauf bachi है
yaha ki koi najr 

dusre logo ne kaha
yaha ke loag है diler
jo vaardaat ke baad bhi
ghro me नहीं rukte

bas chalte jaate है nish din
और chlta rahta है ये सहर
par bhla रोटी ki majboori
dileri thode hoti है

baahr kitna bhi मुस्कुरा le
janta
par har pal jaan jaane ke dar se
anandr hi andar रोटी है

पता नहीं कब रुकेंगे धमाके
और मिटेगा आतंकी panth 
और मुस्कुरा उठेगा ये सहर
और होगी खुसी सबका मन्त्र

शनिवार, 30 जुलाई 2011

CHLO JALAAYE MOAMBATTI

चलो चलकर  जलाए
मोमबत्तिया
हमभी किसी चौक पे
कैमरों के सामने हो खड़े
मुस्कुराए बड़े शौक  से

इसी बहाने कम  से कम
अखबारों में छप जायेंगे
हमारी पहचान के चर्चे
हर जुबा पे बस जायेंगे

लगा ले पावडर
 चमका ले चेहरे की कान्ति  को
तभी तो जलाकर मोम बत्ती
बुला सकेंगे विश्व शांति को

किसी के परिजन
मरे सीमा पर
या झेले आतंकियों का प्रहार
जलाएंगे हम मोम बत्ती
पहनने को चर्चा का हार