एक दिन देखा एक मजदूर को
देखकर सोचा उस मजदूर को
लोग करते है क्यों घृणा
देखकर मजदूर को
जबकि मजदूर के बने घर हम रहते है
वे मजदूर पूरा दिन धुप में तपते है
उन्ही के कारण हम आराम से
सांस लेते है
पर वे बेचारे गर्मी से हाफ्ते है
खून पसीना एक कर
भर न पाते पेट को
फिर भी न जाने क्यों लोग
घृणा से देखते है मजदूर को
मजदूर तो मजदूर है
पर अपनी आदत से भी मजबूर है
अपनी इच्छाओं को करना दफ़न
सायद बेबसी है मजदूर की
मजदूर की मजबूरी का
फायदा उठाना रस है
जो आजकल के सभी सभ्यों
के बस में है
उनके पेट को काटकर
लोग भरते अपने पेट को
और शायद इसीलिए लोग
घृणा करते नही मजदूर से
देखकर सोचा उस मजदूर को
लोग करते है क्यों घृणा
देखकर मजदूर को
जबकि मजदूर के बने घर हम रहते है
वे मजदूर पूरा दिन धुप में तपते है
उन्ही के कारण हम आराम से
सांस लेते है
पर वे बेचारे गर्मी से हाफ्ते है
खून पसीना एक कर
भर न पाते पेट को
फिर भी न जाने क्यों लोग
घृणा से देखते है मजदूर को
मजदूर तो मजदूर है
पर अपनी आदत से भी मजबूर है
अपनी इच्छाओं को करना दफ़न
सायद बेबसी है मजदूर की
मजदूर की मजबूरी का
फायदा उठाना रस है
जो आजकल के सभी सभ्यों
के बस में है
उनके पेट को काटकर
लोग भरते अपने पेट को
और शायद इसीलिए लोग
घृणा करते नही मजदूर से
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