गरज गरज के सावन
बरसा
उनसे मिलने को हृदय
तरशा
नभ में चमक उठे जो
बादल
उनके दीदार को हुआ
पागल
वह दीपशिखा सी
तन्वंगी वह
दूर क्यों हमसे बैठी है
हृदय हमारा,जिनके हृदय का
वर्षो पुराना कैदी है
बूंद जो गिरती है
तन पर
सुध बुध ही खो देता हु
उनसे मिलने की आस लिए
खुली आँखों से सो लेता हु
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