शुक्रवार, 11 नवंबर 2011

budhaapa

बुढापे में मनुष्य
हो जाता है नाम रुई के समान
 उम्र बढ़ते बढ़ते वह
परिवार पर हो जाता बोझ के समान


श्रवण कुमार जैसे पुत्रो का जन्म
अब माता पिता के लिए सपना है
आजकल के पुत्रो में
केवल धन ही अपना है


पैदा होने के बाद ही
शुरू होता क्रम उपकार भूलने का
भूल जाते है की माता पिता
जिन्होंने उन्हें बचपन में पाला
अब वे सायद खुद ,उनसे
वही आकांछा रखते है
पर ये तो केवल वृद्ध सेवा का
झूठा दंभ भरते है


आज के भागम दौर जिन्दगी में
भूल जाते है लोग जन्म दाता को
ये भी भूल जाते है की
इन्ही वृद्धो के कारन ही
धरा पर इनका जीवन संभव है



पर आज कल के परिवार में
नये वृद्धो का पालना असम्भव है


भले ही बुढापे भर बुधो को
रखा जाए भूखा प्यासा
चीथड़े वस्त्र बढाए
उनकी शोभा


पर उनके मरने के बाद
लोग रोने का झूठा ढोंग करते है
जिन्दा रहते भले ही तरश गये हो फलो को
पर मरने के बाद उनके
लोग बांटे फिरते है फलो को


जीवित रहते उनके ,उनसे भले ही
न की हो प्यार से दो बात
पर
चित्र टांगते है दीवार पर उनका
  उनके मरने के बाद



और
यदा कदा उस चित्र को
फूलो से सजाकर
कुछ धुपबत्तियाँ दिखाकर
लोग करते है एक बड़ा दिखावा



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