नभ में घिर आई काली घटा
छाया प्रकृति में खुशियों का नशा
खेत में फसले लगी लहलहाने
कृषक वर्ग लगे मुस्काने
आया मौसम बरसात का
लाया जीवन का सौगात
दादुर पपीहा लगे बोलने
पीपर पात लगे डोलने
मिटटी की सोंधी महक ने
किसानो को हरसाई
रसदार जामुन के फलो ने
बगिया साड़ी महकायी
स्वाति नछत्र के आने पर
चातक ने भी प्यास बुझाई
बरसात आने पर धरा से
सुस्कता ने ली विदाई
इन काले बादलो ने
वियोगी जनों को कस्ट पहुचाई
बरसात को देख देख कर
प्रेमी जनों ने प्रिय मिलन की आस लगाईं
बरसात के आने से
धरा पर हरियाली छाने से
मेढक के बोल सुनाने से
सुकोमल प्रकृति मुस्काई
पानी की बुँदे गिरती मोती सी
खुशिया मन में आती आंधी सी
धरा को अमृत पान कराने
यह वर्षा ऋतू आई
जल थल को एक कर
उंच नीच का भेद मिटाए
नदियों की धरो में भी
जैसे मस्ती सी छाये
वर्षा ऋतू को मनुष्य
जीवनी शक्ति के रूप में याद करते है
बार बार समय से धरा पर आये यह ऋतू
हम यह इस्वर से फ़रियाद करते है
बुधवार, 31 मार्च 2010
रविवार, 28 मार्च 2010
आजादी
यह कैसी बेकार आजादी
हम लोगो के जीवन में आई
सुख के जो सपने देखे थे
उसके उलट दुःख की घटा छाई
आजादी के बाद लोगो में
न जाने कितने अरमान जगे रहे
पर वे सब अरमान
रह गए धरे के धरे
लोगो ने सोचा था की
गोरो के कुसासन से मिलेगी अब मुक्ति
अपने देश में चलेगी
केवल हम अपनो की युक्ति
हम होंगे स्वतंत्रत
खुल के बाते करने को
आम जन भी होगा सछम
अपने सासन चलाने को
क्योकि अब तो देश में
लोअक्तंत्र का राज होगा
और आम जन के हाथ में
इस राज का काज होगा
होगी गरीबी दूर अस्प्रिस्यता की मिटेगी खाई
ख़त्म होगा
जाती पात का भेद भी
होंगे हम सब भाई भाई
पर ये सब भाव
आज अधमरे हो गए
हम लोगो के जो सपने थे
वो सपनो में ही खो गए
आज की इस्तिथि हमारी सोअच
के बिलकुल ही उलट है
आज चारो तरफ
भ्रस्त्ताचार अनीति आदि का ही भरा गरल है
जातिगत भेद भाव से
हमारे समाज का मुह कला है
भाई भतीजावाद व् प्रांतवाद का
हुआ बोल बाला है
आज तमाम अफसर भी
खूंखार भेडियो सा गरजते
स्वर्थी नेता गन भी केवल
अपने फायदे की बात करते
आज चारो तरफ एक
आग सी लगी है
जन साधारण के आजादी की
वो प्यास भी बुझी है
इन सब बातो को देख
लोगो के दिल में उदासी छाई
और लगे सोचने की
उन्होंने ये कैसी आजादी पायी
बीत गए ६० साल
आजादी की वर्षगाँठ मनाते मनाते
हम लोग भी सायद उब चुके है
दुःख के आंसू बहाते बहाते
हम लोगो के जीवन में आई
सुख के जो सपने देखे थे
उसके उलट दुःख की घटा छाई
आजादी के बाद लोगो में
न जाने कितने अरमान जगे रहे
पर वे सब अरमान
रह गए धरे के धरे
लोगो ने सोचा था की
गोरो के कुसासन से मिलेगी अब मुक्ति
अपने देश में चलेगी
केवल हम अपनो की युक्ति
हम होंगे स्वतंत्रत
खुल के बाते करने को
आम जन भी होगा सछम
अपने सासन चलाने को
क्योकि अब तो देश में
लोअक्तंत्र का राज होगा
और आम जन के हाथ में
इस राज का काज होगा
होगी गरीबी दूर अस्प्रिस्यता की मिटेगी खाई
ख़त्म होगा
जाती पात का भेद भी
होंगे हम सब भाई भाई
पर ये सब भाव
आज अधमरे हो गए
हम लोगो के जो सपने थे
वो सपनो में ही खो गए
आज की इस्तिथि हमारी सोअच
के बिलकुल ही उलट है
आज चारो तरफ
भ्रस्त्ताचार अनीति आदि का ही भरा गरल है
जातिगत भेद भाव से
हमारे समाज का मुह कला है
भाई भतीजावाद व् प्रांतवाद का
हुआ बोल बाला है
आज तमाम अफसर भी
खूंखार भेडियो सा गरजते
स्वर्थी नेता गन भी केवल
अपने फायदे की बात करते
आज चारो तरफ एक
आग सी लगी है
जन साधारण के आजादी की
वो प्यास भी बुझी है
इन सब बातो को देख
लोगो के दिल में उदासी छाई
और लगे सोचने की
उन्होंने ये कैसी आजादी पायी
बीत गए ६० साल
आजादी की वर्षगाँठ मनाते मनाते
हम लोग भी सायद उब चुके है
दुःख के आंसू बहाते बहाते
शनिवार, 20 मार्च 2010
हँस दी
आखिर आज हस ही दी
हर एक औरत एक साथ
उनको मिल गया था जो
अपने अधिकारों का साथ
अपने अधिकारों के बल पर
हम बदल देंगी धरा सारी
समवेत स्वर में बोली
मिलकर आज औरते सारी
(राज्य सभा में महिला आरछ्ण विधेयक पास होने पर विशेष )
हर एक औरत एक साथ
उनको मिल गया था जो
अपने अधिकारों का साथ
अपने अधिकारों के बल पर
हम बदल देंगी धरा सारी
समवेत स्वर में बोली
मिलकर आज औरते सारी
(राज्य सभा में महिला आरछ्ण विधेयक पास होने पर विशेष )
ध्यान
आखिर प्रलय हो ही गया
जिसकी मिल रही थी चेतावनिया
प्यारी धरती को ले डूबी हम
हम मानवों की नादानिया
जो बचे वो कम्पित मन से
कर रहे थे बस एक ही ध्यान
काश हम लोगो ने इससे बचने का
किया होता पहले कुछ काम
विश्व तापमान में वृद्धि होने पर (विशेष)
जिसकी मिल रही थी चेतावनिया
प्यारी धरती को ले डूबी हम
हम मानवों की नादानिया
जो बचे वो कम्पित मन से
कर रहे थे बस एक ही ध्यान
काश हम लोगो ने इससे बचने का
किया होता पहले कुछ काम
विश्व तापमान में वृद्धि होने पर (विशेष)
सोचु
मुस्कुराती रहु इठलाती रहु
बस एक ही नाम गुनगुनाती रहु
मिलन की आस कुछ ऐसी लगी की
ख्वाबो में भी उनको बुलाती रहु
मेरे उर में आ रही है
बस प्रियतम की याद
सोचु अब मै बिन उनके
कैसे कटेगा ये मधुमास
बस एक ही नाम गुनगुनाती रहु
मिलन की आस कुछ ऐसी लगी की
ख्वाबो में भी उनको बुलाती रहु
मेरे उर में आ रही है
बस प्रियतम की याद
सोचु अब मै बिन उनके
कैसे कटेगा ये मधुमास
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