बालश्रम को रोकने का
अधिनियम पारित हुआ
पर न जाने किन कारणों से
केवल हाथी दात साबित हुआ
आज भी न जाने कितने
देश के कर्णधार माने जाने वाले
असंख्यो बच्चे
सुबह से ही दिन रात जी तोड़ मेहनत करते है
और यही उनका भविष्य भी
बन जाता है
पर पता नहीं हमारे समाज को
कुछ समझ में क्यों न आता है
या शायद कुछ समझ में आता हो
पर उन लड़को के माँ बाप को
इसके सिवा दूजा
शायद ही कोई रास्ता नजर आता हो
मजबूरी बस पेट पालने के लिए ही
शायद पूरा जीवन जीते है
जन्म से लेकर मौत तक वे
केवल श्रम ही करते है
उन बच्चो के अपने सपने
बचपन में ही मिट जाते है
शायद उनके बालाधिकार भी
गुमनामी में गूम होते है
लोअग भूल जाते है की बच्चे ही
होते है कर्णधार धरा के
वे तो सपने देखते है
केवल अपनी रोटी के
पालको की दया पर निर्भर
सहते है शोषण ही शोषण
पर वे रोटी के कारन ही
मजबूरी बस करते धैर्य धारण
पतले पतले पैरो वाले
बड़े निकले पतो वाले
इन गरीब बच्चो के बल पर
यह देश अहम् भरता है
और यह दृश्य हमारे
समाज की विडम्बना को व्यक्त करता है
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें