नभ में घिर आई काली घटा
छाया प्रकृति में खुशियों का नशा
खेत में फसले लगी लहलहाने
कृषक वर्ग लगे मुस्काने
आया मौसम बरसात का
लाया जीवन का सौगात
दादुर पपीहा लगे बोलने
पीपर पात लगे डोलने
मिटटी की सोंधी महक ने
किसानो को हरसाई
रसदार जामुन के फलो ने
बगिया साड़ी महकायी
स्वाति नछत्र के आने पर
चातक ने भी प्यास बुझाई
बरसात आने पर धरा से
सुस्कता ने ली विदाई
इन काले बादलो ने
वियोगी जनों को कस्ट पहुचाई
बरसात को देख देख कर
प्रेमी जनों ने प्रिय मिलन की आस लगाईं
बरसात के आने से
धरा पर हरियाली छाने से
मेढक के बोल सुनाने से
सुकोमल प्रकृति मुस्काई
पानी की बुँदे गिरती मोती सी
खुशिया मन में आती आंधी सी
धरा को अमृत पान कराने
यह वर्षा ऋतू आई
जल थल को एक कर
उंच नीच का भेद मिटाए
नदियों की धरो में भी
जैसे मस्ती सी छाये
वर्षा ऋतू को मनुष्य
जीवनी शक्ति के रूप में याद करते है
बार बार समय से धरा पर आये यह ऋतू
हम यह इस्वर से फ़रियाद करते है
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