गुजारी है मैंने राते कई
सपनों के बारे में सोचकर
एकटक देखता रहा हु उनको
पलको का गिरना रोककर
सपनों की चाह ही
कुछ करने को उकसाती है
सभ मार्ग बंद से दिखे तो
कुछ नया ढूढना सिखाती है
सोचता हु कभी कभी ,गर
मनुज के पास सपना न होता
देख रहे जो यहाँ आज कुछ
क्या उनका दिखना होता
जब भी भटका या रुका मानव
जीवन की पगदंदियो पर
सपनो की ख्वाहिश ने ही
संभाला है उन्हें जाकर
मै भी तो उसी वंश का
इक छोटा सा वारिश हु
उन्ही गुणों अवगुणों से संपन्न
सपना पाने की तैयारी में हु
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