आज इस धरा पर
इक बड़ी बिमारी फैली
मनुष्य है इससे प्रभावित
नाम है इसका भुखमरी
पेट के लिए ही तो
लोअग न जाने क्या के करते है
फिर भी इस धरा पर
करोनो के पेट न भरते है
वे मजबूर है
यूँ ही भूखा जीवन बिताने को
धरा पर इतना कुछ होते हुए भी
आधा पेट खाने को
भूख छीन लेती है
जिन्दगी जीने की शक्ति
न जाने कितने लोगो की
होती है असमय मृत्यु
इससे कुछ सोचने की शक्ति भी
ख़त्म हो चुकी होती ही
न जाने कितनी ललनाये
भूखे पेट सोती ही
1 टिप्पणी:
विपिन . शुभाशीष ब्लाँग के लिए । कविताएँ सामयिक हैं , लिखते रहो लेखनी स्वयं मँज जाएगी ।
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