बेटा अपने खानदान के नाम को
भुनाता है किस कदर
बानगी गर देखनी हो
देश की राजनीति पर डाले नजर
जैसे उद्योग जगत में
कुछ घराने है जमे हुए
राजनीति में भी कुछ परिवार
है पुश्तो से लगे हुए
आज भारतीय संसद भी
रिश्तेदारों की ठौर बनी
मर्यादाये भले ही कम हो
पर रिश्तेदारों की न कोई कमी
उत्तर दक्षिण, पूरब pashchim
चहु और इक हवा बह रही
कही बाप बेटा तो कही माँ बेटे की जोड़ी
है शासन कर रही
आज देश में लोक तंत्र की
परिभाषा है बदल गयी
जनता की जगह,परिवार रख
परिभाषा है बनी नयी
आज परिवार का,परिवार के लिए
शासन है हो रहा
और इसी लिए देश का लोकतंत्र
चमक अपनी खो रहा
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