गुरुवार, 16 सितंबर 2010

parivaarvaad

बेटा अपने खानदान के नाम को
भुनाता है किस कदर
बानगी गर देखनी हो
देश की राजनीति पर डाले नजर

जैसे उद्योग जगत में
कुछ घराने है जमे हुए
राजनीति में भी कुछ  परिवार
है पुश्तो से लगे हुए

आज भारतीय संसद भी
रिश्तेदारों की ठौर बनी
मर्यादाये भले ही कम हो
पर रिश्तेदारों की न कोई कमी

उत्तर दक्षिण, पूरब pashchim 
चहु और इक हवा बह रही
कही बाप बेटा तो कही माँ बेटे की जोड़ी
है शासन कर रही

आज देश में लोक तंत्र की
परिभाषा है बदल गयी
जनता की जगह,परिवार रख
परिभाषा है बनी नयी

आज परिवार का,परिवार के लिए
शासन है हो रहा
और इसी लिए  देश का लोकतंत्र
चमक अपनी खो रहा   

कोई टिप्पणी नहीं: