गुरुवार, 20 मई 2010

सिखा कहाँ

सागर के सोअख लहरों की चंचलता
है तुमने कहा से पाई
देखते ही दिल चुराने की अदा
है तुममे कहा से आई

फूलो सा मुस्कुराना प्रिये
तुने है कहाँ से सीखा
कैसे दिखती हो इतना सुन्दर
सामने चाद भी प़र जाए फीका

सीखी कहाँ से मीठी बाते
कहाँ से पायी हिरनी सी आँखे
कहाँ से सिखा है जुल्फों का उ लहराना
चलते चलते देखकर हमको ,शरमाकर ठहर जाना

कुछ ऐसे ही मधुर सवाल
जेहन में मेरे उमड़ रहे
तेरी यादो के बादल
दिल में मेरे बरस रहे

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