जीवन का संघर्षो में
अनगिनत बार टुटा हु मै
बार बार बुलन्द हौसले के साथ
उनसे भिड़ाने को जुटा हु मै
जब जब समय की धरा मुझे
कमजोर करने लगी
जब जब उम्मीद की किरण
आँखों से दूर होने लगी
तब तब दिल को समझाकर
बाधाओ से ध्यान हटाकर
लक्ष्य पर निसाना लगाया
और समय के थपेड़ो को हटा
उनको मने अपनाया
जब जब दिल में मेरे
निराशा की हुक उठने लगी
मेरी मंजिल मेरी नजरो से
बहुत दूर लगने लगी
तब तब मुझे मानव की मानवता
अपनी श्रेष्ठता की एह्स्सास कराती रही
तब तब फिर बढे कदम मंजिलो की ओर
सोचा थोडा दूर ही सही
उ ही नहीं आज हम
धरा पर श्रेष्ठ है
चुकाई है इसकी पूरी कीमत
तब हमें मिला अपना यथेस्ट है
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