गुरुवार, 16 सितंबर 2010

baadh

आसाढ़ के वर्षा के दिनों में
मै गया कुछ काम से खेतो में
जब दिखा चारो और जल ही जल
लगा की हु मै सपनो में

चारो तरफ सफ़ेद बर्फ सा
जल का जाल था बिछा
उस सफ़ेद जल में ही
मंजर तबाही का था छिपा

जब नदियों ने तोड़ दी
अपनी करारे
न जाने कितने लोग
असमय ही जिन्दगी हारे

चारो तरफ फैली थी
उस अमृतमयी विष की छाया
पल पल नदी बदल रही थी
अपनी वो प्रलयंकारी माया

उन्ही जलो की कल- कल सुनकर
कभी थे कानो में बंसी बजते
अब उन्ही आवाजो को सुनकर
ह्रदय में दुःख के सागर भरते

इसी तरह हर साल
मचाती रहती चीख पुकार
हमारे निति नियंताओ को ये सब
लगता है इक दम बेकार

चीखने चिल्लाने वाला
कोई अमीर नहीं होता है
बाढ़ में सबसे अधिक
इक गरीब ही रोता है

लुटने वाले लुटते है
 दुःख की इन दशाओं में
गरीबो की चीख पुकारे
फ़ैल जाती है फिजाओं में भी

तबाही की ये कहानी
हर साल है दुहराई जाती
इनसे बचने की योजनाये
 है कागजो में बनाई जाती

कागजो की ये योजनाये
नहीं कभी सफल हुई
फिर भी हर साल योजनाये
बनती है नयी नयी

parivaarvaad

बेटा अपने खानदान के नाम को
भुनाता है किस कदर
बानगी गर देखनी हो
देश की राजनीति पर डाले नजर

जैसे उद्योग जगत में
कुछ घराने है जमे हुए
राजनीति में भी कुछ  परिवार
है पुश्तो से लगे हुए

आज भारतीय संसद भी
रिश्तेदारों की ठौर बनी
मर्यादाये भले ही कम हो
पर रिश्तेदारों की न कोई कमी

उत्तर दक्षिण, पूरब pashchim 
चहु और इक हवा बह रही
कही बाप बेटा तो कही माँ बेटे की जोड़ी
है शासन कर रही

आज देश में लोक तंत्र की
परिभाषा है बदल गयी
जनता की जगह,परिवार रख
परिभाषा है बनी नयी

आज परिवार का,परिवार के लिए
शासन है हो रहा
और इसी लिए  देश का लोकतंत्र
चमक अपनी खो रहा   

बुधवार, 8 सितंबर 2010

chandrama

लेकर सूर्य से उस्ण तपन
फैलाता धरा पर शान्ति  अमन
दीखता तब जब छिपे दिवाकर
तभी तो कहते इसे निशाकर

असह्य ताप स्वयं ही सहकर
खुले आकाश में यु ही तपकर
राते रोशन करता धरती पर
लगता है सबको अति सुन्दर

न जाने कितने नखत गणों का
यही अकेला स्वामी है
पीत रंग से ढका हुआ है
चकवा जिसका प्रेमी है

न जाने कितने प्रेमियों को
रात भर जगाता है
हर विरही के आँखों में
स्वप्न बनकर छाता है

थोड़े काले धब्बे भी
मान न इसका घटा पाते
अनगिनत सुन्दरियों के चेहरे
चन्द्र उपमा से लजाते

कृष्ण पक्ष की काली रात
कुछ न इसका बीगार पाती
जब आये चांदनी रात
इसकी और उड़े चकवा पाखी

अति पूरा काल से
कवियों का अति प्रिय रहा
न जाने कितने युगों से
यह रात में मिश्री घोल रहा

घटते बढते रहने पर भी
यह न कभी घबराता है
धैर्य धारण करता है और
पूर्ण रूप भी पता है
तभी तो यह निशा पति कहलाता है

बुधवार, 11 अगस्त 2010

basant

जब जब बसंत आता है
नै उमंगे भी लाता है
पेड़ो पर नै नै कोपले
चारो तरफ की सुन्दर दृश्यावली
मानव मन को भाती है  
कोयले भी गाती है नित नए उत्साह से
सरसों भी फूलते है बड़े सुन्दर

आमो के बागो इ मौरे
उन पर काले काले भौरे
जैसे चले आते है दौड़े
प्रकृति सदा मुस्काती रहती
नित नए रूप दिखाती रहती

मानव का मन भी भर जाता
नित नए उत्साह से
बसंत तो है प्रेम की ऋतू
जीर्ण सिर्ण को त्याग कर
प्रकृति करती रूप नविन धारण

प्रकृति सदा मुस्काती रहती
प्रेम सदा बरसाती रहती
ऋतुराज की महिमा अनंत
यह है प्यारा प्यारा बसंत  

रविवार, 23 मई 2010

kadaadi

गर्मी की दोपह्रियो में
पके गेहू के खेतो में
ढूंड रहे थे जीवन का अंस
कुछ कडादी के वंसज   गन

ज्यो ज्यो गेंहू कटते जाते
और कुछ धरा पर गिरते जाते
त्यों त्यों कुछ मानव जन
उनको जीवन खातिर चुनते जाते

उन प्रचंड दोपहरियो में
स्वेद व् धुल से सने हुए
कुछ चिथड़े पहने हुए
बेचारे अन्न  वे चुनते जाते

वे लोअग जानते है की यही
उनके वर्ष भर की कमाई है
इन गिरे अन्नो में ही 
इनके जीवन की ज्योति समाई है

पूरा काल में धरा पर
इक ही कडादी रहते थे
जो अन्न चुन चुन कर धरा से
अपना पेट भरते थे

और इसी कर्म के कारण
उनका नाम जग में अमर हुआ

पर आज न जाने कितने लोग
कडादी के तरह ही
धरा से अन्न चुना करते है
और उसी के सहारे अपना पेट भरते है

फिर भी इनके लिए
धरा पर पूछ ताछ करने वाला न कोई
बिन इनके बारे में कुछ सोचे
मानवता भी सोई

गुरुवार, 20 मई 2010

सिखा कहाँ

सागर के सोअख लहरों की चंचलता
है तुमने कहा से पाई
देखते ही दिल चुराने की अदा
है तुममे कहा से आई

फूलो सा मुस्कुराना प्रिये
तुने है कहाँ से सीखा
कैसे दिखती हो इतना सुन्दर
सामने चाद भी प़र जाए फीका

सीखी कहाँ से मीठी बाते
कहाँ से पायी हिरनी सी आँखे
कहाँ से सिखा है जुल्फों का उ लहराना
चलते चलते देखकर हमको ,शरमाकर ठहर जाना

कुछ ऐसे ही मधुर सवाल
जेहन में मेरे उमड़ रहे
तेरी यादो के बादल
दिल में मेरे बरस रहे

रविवार, 9 मई 2010

माँ

आँचल में अपने हमे छिपा
जो बुरी नजरो से बचाती है
हमारे हर इक कदम पर
हौसला जो बढ़ाती है

अपने दुखो को भूल
जो हमें हँसाती है
ऐसी करामात की शक्ति
बस माँ में नजर आती है

विश्व मात्रित्तव दिवस पर विशेस

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

मानव

जीवन का संघर्षो में
अनगिनत बार टुटा हु मै
बार बार बुलन्द हौसले के साथ
उनसे भिड़ाने को जुटा हु मै

जब जब समय की धरा मुझे
कमजोर करने लगी
जब जब उम्मीद की किरण
आँखों से दूर होने लगी

तब तब दिल को समझाकर
बाधाओ से ध्यान हटाकर
लक्ष्य पर निसाना लगाया
और समय के थपेड़ो को हटा
उनको मने अपनाया

जब जब दिल में मेरे
निराशा की हुक उठने लगी
मेरी मंजिल मेरी नजरो से
बहुत दूर लगने लगी

तब तब मुझे मानव की मानवता
अपनी श्रेष्ठता की एह्स्सास कराती रही
तब तब फिर बढे कदम मंजिलो की ओर
सोचा थोडा दूर ही सही

उ ही नहीं आज हम
धरा पर श्रेष्ठ है
चुकाई है इसकी पूरी कीमत
तब हमें मिला अपना यथेस्ट है

गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

पप्पू पास हो गया

गुरूजी की दया से
आखिर पप्पू पास हो गया
और लोगो की नजरो में
तुरंत आम से खास हो गया

याद आते है पप्पू को
परीक्षा के वो सुनहरे दिन
नक़ल करने के लिए उसने
कैसे थे दिए पैसे पैसे गिन गिन

गुरूजी ने भी उस पर
पुत्रवत स्नेह बरसाया
पास होने के लिए पप्पू को
नक़ल का हर गुर सिखलाया

जान गया है पप्पू अब
नक़ल की महानता को
कैसे मिटा देती है ये
ज्ञान अज्ञान की असमानता को

आजकल अनगिनत पप्पू
हर जगह मिला करते है
हाथ में लेकर अपनी डिग्री
ताउम्र फिरा करते है

आंसू गिराते रहते है ये
देश की वयवस्था पर
चलो हम भी नजर द्दाल ले
इनकी दयनीय अवस्था पर