रविवार, 23 मई 2010

kadaadi

गर्मी की दोपह्रियो में
पके गेहू के खेतो में
ढूंड रहे थे जीवन का अंस
कुछ कडादी के वंसज   गन

ज्यो ज्यो गेंहू कटते जाते
और कुछ धरा पर गिरते जाते
त्यों त्यों कुछ मानव जन
उनको जीवन खातिर चुनते जाते

उन प्रचंड दोपहरियो में
स्वेद व् धुल से सने हुए
कुछ चिथड़े पहने हुए
बेचारे अन्न  वे चुनते जाते

वे लोअग जानते है की यही
उनके वर्ष भर की कमाई है
इन गिरे अन्नो में ही 
इनके जीवन की ज्योति समाई है

पूरा काल में धरा पर
इक ही कडादी रहते थे
जो अन्न चुन चुन कर धरा से
अपना पेट भरते थे

और इसी कर्म के कारण
उनका नाम जग में अमर हुआ

पर आज न जाने कितने लोग
कडादी के तरह ही
धरा से अन्न चुना करते है
और उसी के सहारे अपना पेट भरते है

फिर भी इनके लिए
धरा पर पूछ ताछ करने वाला न कोई
बिन इनके बारे में कुछ सोचे
मानवता भी सोई

गुरुवार, 20 मई 2010

सिखा कहाँ

सागर के सोअख लहरों की चंचलता
है तुमने कहा से पाई
देखते ही दिल चुराने की अदा
है तुममे कहा से आई

फूलो सा मुस्कुराना प्रिये
तुने है कहाँ से सीखा
कैसे दिखती हो इतना सुन्दर
सामने चाद भी प़र जाए फीका

सीखी कहाँ से मीठी बाते
कहाँ से पायी हिरनी सी आँखे
कहाँ से सिखा है जुल्फों का उ लहराना
चलते चलते देखकर हमको ,शरमाकर ठहर जाना

कुछ ऐसे ही मधुर सवाल
जेहन में मेरे उमड़ रहे
तेरी यादो के बादल
दिल में मेरे बरस रहे

रविवार, 9 मई 2010

माँ

आँचल में अपने हमे छिपा
जो बुरी नजरो से बचाती है
हमारे हर इक कदम पर
हौसला जो बढ़ाती है

अपने दुखो को भूल
जो हमें हँसाती है
ऐसी करामात की शक्ति
बस माँ में नजर आती है

विश्व मात्रित्तव दिवस पर विशेस

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

मानव

जीवन का संघर्षो में
अनगिनत बार टुटा हु मै
बार बार बुलन्द हौसले के साथ
उनसे भिड़ाने को जुटा हु मै

जब जब समय की धरा मुझे
कमजोर करने लगी
जब जब उम्मीद की किरण
आँखों से दूर होने लगी

तब तब दिल को समझाकर
बाधाओ से ध्यान हटाकर
लक्ष्य पर निसाना लगाया
और समय के थपेड़ो को हटा
उनको मने अपनाया

जब जब दिल में मेरे
निराशा की हुक उठने लगी
मेरी मंजिल मेरी नजरो से
बहुत दूर लगने लगी

तब तब मुझे मानव की मानवता
अपनी श्रेष्ठता की एह्स्सास कराती रही
तब तब फिर बढे कदम मंजिलो की ओर
सोचा थोडा दूर ही सही

उ ही नहीं आज हम
धरा पर श्रेष्ठ है
चुकाई है इसकी पूरी कीमत
तब हमें मिला अपना यथेस्ट है

गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

पप्पू पास हो गया

गुरूजी की दया से
आखिर पप्पू पास हो गया
और लोगो की नजरो में
तुरंत आम से खास हो गया

याद आते है पप्पू को
परीक्षा के वो सुनहरे दिन
नक़ल करने के लिए उसने
कैसे थे दिए पैसे पैसे गिन गिन

गुरूजी ने भी उस पर
पुत्रवत स्नेह बरसाया
पास होने के लिए पप्पू को
नक़ल का हर गुर सिखलाया

जान गया है पप्पू अब
नक़ल की महानता को
कैसे मिटा देती है ये
ज्ञान अज्ञान की असमानता को

आजकल अनगिनत पप्पू
हर जगह मिला करते है
हाथ में लेकर अपनी डिग्री
ताउम्र फिरा करते है

आंसू गिराते रहते है ये
देश की वयवस्था पर
चलो हम भी नजर द्दाल ले
इनकी दयनीय अवस्था पर

बुधवार, 21 अप्रैल 2010

खोज

कर रहा जीवन की रपटीली रहो में
अपने अस्तित्व की खोज मै
सायद मिल जाये लक्ष्य मुझको
यही सोचता रोज मै

कौन हु,क्या करना है
जैसे अनसुलझे प्रश्न
करत्व निस दिन व्यथित मुझको
जो बता सके इन बातो को
धुड़ता firta mai usko

jeevan kya isi tarah
jine ka naam hai
ya khuchh aur bhi hai
jiska hame na gyan hai

gar mai in baato ka
bhed mai jaan jata
tab mai jeevan bhar
nischya hamesa muskurata

सिक्षा का अधकार कानून पर

अब हर चंपा निश्चय ही
काले अछर चिन्हेगी
बदलेगी अब जीवन धारा
अब कबाड़ न बिनेगी

आ गयी है देश में
शिछा की एक नयी क्रांति
सायद अब दूर हो जाए
अज्ञान की फैली अशांति

अब छोटू,घिस्सू,नाथू,
जैसो के चेहरों पर chamak dikh रही
पाना चाहते है वो भी ज्ञान
इसकी उनमे ललक दिख रही

अब समाज का हर तबका
ज्ञान से आलोकित होगा
खिलेगी अब हर कलि
हर इक बच्चा पुलकित होंगा

पर ये सब बाते
कही स्वपन न हो जाए
सुरु होने के पहले ही
खत्म कही न हो जाए

गर देश को विकसित करना है
सर्व समाज को शिछित करना है
हमें अभी से लगाना होगा
पूर्ण न हो lakshya jab तक ,हमें नहीं रुकना होगा

बुधवार, 14 अप्रैल 2010

भुखमरी

आज इस धरा पर
इक बड़ी बिमारी फैली
मनुष्य है इससे प्रभावित
नाम है इसका भुखमरी

पेट के लिए ही तो
लोअग न जाने क्या के करते है
फिर भी इस धरा पर
करोनो के पेट न भरते है

वे मजबूर है
यूँ ही भूखा जीवन बिताने को
धरा पर इतना कुछ होते हुए भी
आधा पेट खाने को

भूख छीन लेती है
जिन्दगी जीने की शक्ति
न जाने कितने लोगो की
होती है असमय मृत्यु

इससे कुछ सोचने की शक्ति भी
ख़त्म हो चुकी होती ही
न जाने कितनी ललनाये
भूखे पेट सोती ही

मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

नक्सलियों के हमलो पर दिल के उदगार

सानिया शोएब की शादी में उलझा हुआ है देश
इधर नक्सलियों के हमलो में रह जा रहे जवान खेत

सायद हमें आदत सी हो गयी है ,सच को यु छुपाने की
हर इक हमले के बाद बस यूँ ही बद्द्बदाने की

कहने को तो ये अपनो की अपनो से लड़ाई है
पर जाकर कोई उनको देखे जिनके अपनो ने प्राण गवाई है

अगर हम अब भी न चेते तो देर बहुत हो जाएगा
हम यूँ ही देखते रहेंगे और देश टुकड़ो में बात जाएगा

पिट लेता हु अपना सर नेताओं की बाते सुन
उनकी संवेदनाये भी न जाने कहा है गुम

कहा गए वो लोअग जो लगाते है नक्सलियों के लिए मदद की गुहार
क्या उन्हें सुनने नहीं दे रही देशवासियों की करूँ पुकार

हर इक हमले के बाद खून के आंसू रोया हु मै
याकि मानिए कई कई रात चैन न सोया हु मैं