गुरुवार, 25 नवंबर 2010
बुधवार, 17 नवंबर 2010
kaun roak sakta hai
kaun rok sakata hai
hone se desh ka banta dhaar
lage huye hai
jb eas kaam me
desh ke hi sutradhaar
neta naukarsaaho ki
jodi hai eas kadar hai bani
ean logo ki giddh dristi
sansaadhano par hai lagi
kaise kate garibo ka pet
noto se bhare amiro ki jeb
nit kuchh aisi hi yojnaaye
manoyog se ban rahi
tabhi to aaj
amir garib me than rahi
kahi gir rahe bom
kahi banduke chal rahi
manavata aaj ke parivesh me
dhu dhu kar jal rahi
naitikta ki baat n bachi
garibo ke chulhe ki
aag n bachi
aub bhala kya hoga hamara
jub kisi ki naak na bachi
hone se desh ka banta dhaar
lage huye hai
jb eas kaam me
desh ke hi sutradhaar
neta naukarsaaho ki
jodi hai eas kadar hai bani
ean logo ki giddh dristi
sansaadhano par hai lagi
kaise kate garibo ka pet
noto se bhare amiro ki jeb
nit kuchh aisi hi yojnaaye
manoyog se ban rahi
tabhi to aaj
amir garib me than rahi
kahi gir rahe bom
kahi banduke chal rahi
manavata aaj ke parivesh me
dhu dhu kar jal rahi
naitikta ki baat n bachi
garibo ke chulhe ki
aag n bachi
aub bhala kya hoga hamara
jub kisi ki naak na bachi
YARANA: aaj ka samay
YARANA: aaj ka samay: "aaj ke sabhya samaaj me dekha jaa sakta hai garibo ko rote huye amiro ko sote huye netaao ki kutil muskaan yvaao ki ek alag pahchaan ..."
aaj ka samay
aaj ke sabhya samaaj me
dekha jaa sakta hai
garibo ko rote huye
amiro ko sote huye
netaao ki kutil muskaan
yvaao ki ek
alag pahchaan
swarh bhara dhaarmik tufaan
naitikta ka hota apmaan
kaagajo me mahilaao ka sammaman
yatharth me hota apmaan
naye vikaas ki terhi
chaal
aadhi aabadi ko
hota behaal
kaale krishkaay rote ladke
kandho par bojho ko dhote huye
dekha jaa sakta hai
vo sab kuchh
jo maanav ke dil ko
dahla de
jo ki pathar ko bhi
pighla de
dekha jaa sakta hai
garibo ko rote huye
amiro ko sote huye
netaao ki kutil muskaan
yvaao ki ek
alag pahchaan
swarh bhara dhaarmik tufaan
naitikta ka hota apmaan
kaagajo me mahilaao ka sammaman
yatharth me hota apmaan
naye vikaas ki terhi
chaal
aadhi aabadi ko
hota behaal
kaale krishkaay rote ladke
kandho par bojho ko dhote huye
dekha jaa sakta hai
vo sab kuchh
jo maanav ke dil ko
dahla de
jo ki pathar ko bhi
pighla de
रविवार, 14 नवंबर 2010
kya prlya sach me aayega
अब तो चंद वर्ष बचे है
सब ख़त्म हो जायेगा
मौज मस्ती कर लो यारो
साथ में कुछ न जायेगा
यही आज टेलीविजनो के
हर चैनलों पर था आ रहा
चैनल का एंकर भी
न जाने कितना भय था दिखा रहा
लोग सहम गए है,जबसे
सुनने में आई है ये बात
डर के मारे अब तो
नींद न आती सारी रात
लोग अपने अपने भविष्य को लेकर
अभी से चिंतित हो गए
लगे सोचने की आखिर
कैसे पुरे होंगे सपने नए
मै भी सोचने को हुआ मजबूर
क्या प्रलय की बात सही है
ख़त्म हो जायेगी मानवता
क्या यह बात इक दम नयी है
बिन माझी की कश्ती की तरह तो
मानवता कब की डूब चुकी
नैतिक बातो के बोझ से
ये दुनिया कब की उब चुकी
रही प्रलय की बात
वो तो प्रतिदिन घट रही
अपने इन दुर्दिन के दिनों में
धरती भी है सिसक रही
सब ख़त्म हो जायेगा
मौज मस्ती कर लो यारो
साथ में कुछ न जायेगा
यही आज टेलीविजनो के
हर चैनलों पर था आ रहा
चैनल का एंकर भी
न जाने कितना भय था दिखा रहा
लोग सहम गए है,जबसे
सुनने में आई है ये बात
डर के मारे अब तो
नींद न आती सारी रात
लोग अपने अपने भविष्य को लेकर
अभी से चिंतित हो गए
लगे सोचने की आखिर
कैसे पुरे होंगे सपने नए
मै भी सोचने को हुआ मजबूर
क्या प्रलय की बात सही है
ख़त्म हो जायेगी मानवता
क्या यह बात इक दम नयी है
बिन माझी की कश्ती की तरह तो
मानवता कब की डूब चुकी
नैतिक बातो के बोझ से
ये दुनिया कब की उब चुकी
रही प्रलय की बात
वो तो प्रतिदिन घट रही
अपने इन दुर्दिन के दिनों में
धरती भी है सिसक रही
शनिवार, 13 नवंबर 2010
sapana
गुजारी है मैंने राते कई
सपनों के बारे में सोचकर
एकटक देखता रहा हु उनको
पलको का गिरना रोककर
सपनों की चाह ही
कुछ करने को उकसाती है
सभ मार्ग बंद से दिखे तो
कुछ नया ढूढना सिखाती है
सोचता हु कभी कभी ,गर
मनुज के पास सपना न होता
देख रहे जो यहाँ आज कुछ
क्या उनका दिखना होता
जब भी भटका या रुका मानव
जीवन की पगदंदियो पर
सपनो की ख्वाहिश ने ही
संभाला है उन्हें जाकर
मै भी तो उसी वंश का
इक छोटा सा वारिश हु
उन्ही गुणों अवगुणों से संपन्न
सपना पाने की तैयारी में हु
सपनों के बारे में सोचकर
एकटक देखता रहा हु उनको
पलको का गिरना रोककर
सपनों की चाह ही
कुछ करने को उकसाती है
सभ मार्ग बंद से दिखे तो
कुछ नया ढूढना सिखाती है
सोचता हु कभी कभी ,गर
मनुज के पास सपना न होता
देख रहे जो यहाँ आज कुछ
क्या उनका दिखना होता
जब भी भटका या रुका मानव
जीवन की पगदंदियो पर
सपनो की ख्वाहिश ने ही
संभाला है उन्हें जाकर
मै भी तो उसी वंश का
इक छोटा सा वारिश हु
उन्ही गुणों अवगुणों से संपन्न
सपना पाने की तैयारी में हु
गुरुवार, 16 सितंबर 2010
baadh
आसाढ़ के वर्षा के दिनों में
मै गया कुछ काम से खेतो में
जब दिखा चारो और जल ही जल
लगा की हु मै सपनो में
चारो तरफ सफ़ेद बर्फ सा
जल का जाल था बिछा
उस सफ़ेद जल में ही
मंजर तबाही का था छिपा
जब नदियों ने तोड़ दी
अपनी करारे
न जाने कितने लोग
असमय ही जिन्दगी हारे
चारो तरफ फैली थी
उस अमृतमयी विष की छाया
पल पल नदी बदल रही थी
अपनी वो प्रलयंकारी माया
उन्ही जलो की कल- कल सुनकर
कभी थे कानो में बंसी बजते
अब उन्ही आवाजो को सुनकर
ह्रदय में दुःख के सागर भरते
इसी तरह हर साल
मचाती रहती चीख पुकार
हमारे निति नियंताओ को ये सब
लगता है इक दम बेकार
चीखने चिल्लाने वाला
कोई अमीर नहीं होता है
बाढ़ में सबसे अधिक
इक गरीब ही रोता है
लुटने वाले लुटते है
दुःख की इन दशाओं में
गरीबो की चीख पुकारे
फ़ैल जाती है फिजाओं में भी
तबाही की ये कहानी
हर साल है दुहराई जाती
इनसे बचने की योजनाये
है कागजो में बनाई जाती
कागजो की ये योजनाये
नहीं कभी सफल हुई
फिर भी हर साल योजनाये
बनती है नयी नयी
मै गया कुछ काम से खेतो में
जब दिखा चारो और जल ही जल
लगा की हु मै सपनो में
चारो तरफ सफ़ेद बर्फ सा
जल का जाल था बिछा
उस सफ़ेद जल में ही
मंजर तबाही का था छिपा
जब नदियों ने तोड़ दी
अपनी करारे
न जाने कितने लोग
असमय ही जिन्दगी हारे
चारो तरफ फैली थी
उस अमृतमयी विष की छाया
पल पल नदी बदल रही थी
अपनी वो प्रलयंकारी माया
उन्ही जलो की कल- कल सुनकर
कभी थे कानो में बंसी बजते
अब उन्ही आवाजो को सुनकर
ह्रदय में दुःख के सागर भरते
इसी तरह हर साल
मचाती रहती चीख पुकार
हमारे निति नियंताओ को ये सब
लगता है इक दम बेकार
चीखने चिल्लाने वाला
कोई अमीर नहीं होता है
बाढ़ में सबसे अधिक
इक गरीब ही रोता है
लुटने वाले लुटते है
दुःख की इन दशाओं में
गरीबो की चीख पुकारे
फ़ैल जाती है फिजाओं में भी
तबाही की ये कहानी
हर साल है दुहराई जाती
इनसे बचने की योजनाये
है कागजो में बनाई जाती
कागजो की ये योजनाये
नहीं कभी सफल हुई
फिर भी हर साल योजनाये
बनती है नयी नयी
parivaarvaad
बेटा अपने खानदान के नाम को
भुनाता है किस कदर
बानगी गर देखनी हो
देश की राजनीति पर डाले नजर
जैसे उद्योग जगत में
कुछ घराने है जमे हुए
राजनीति में भी कुछ परिवार
है पुश्तो से लगे हुए
आज भारतीय संसद भी
रिश्तेदारों की ठौर बनी
मर्यादाये भले ही कम हो
पर रिश्तेदारों की न कोई कमी
उत्तर दक्षिण, पूरब pashchim
चहु और इक हवा बह रही
कही बाप बेटा तो कही माँ बेटे की जोड़ी
है शासन कर रही
आज देश में लोक तंत्र की
परिभाषा है बदल गयी
जनता की जगह,परिवार रख
परिभाषा है बनी नयी
आज परिवार का,परिवार के लिए
शासन है हो रहा
और इसी लिए देश का लोकतंत्र
चमक अपनी खो रहा
भुनाता है किस कदर
बानगी गर देखनी हो
देश की राजनीति पर डाले नजर
जैसे उद्योग जगत में
कुछ घराने है जमे हुए
राजनीति में भी कुछ परिवार
है पुश्तो से लगे हुए
आज भारतीय संसद भी
रिश्तेदारों की ठौर बनी
मर्यादाये भले ही कम हो
पर रिश्तेदारों की न कोई कमी
उत्तर दक्षिण, पूरब pashchim
चहु और इक हवा बह रही
कही बाप बेटा तो कही माँ बेटे की जोड़ी
है शासन कर रही
आज देश में लोक तंत्र की
परिभाषा है बदल गयी
जनता की जगह,परिवार रख
परिभाषा है बनी नयी
आज परिवार का,परिवार के लिए
शासन है हो रहा
और इसी लिए देश का लोकतंत्र
चमक अपनी खो रहा
बुधवार, 8 सितंबर 2010
chandrama
लेकर सूर्य से उस्ण तपन
फैलाता धरा पर शान्ति अमन
दीखता तब जब छिपे दिवाकर
तभी तो कहते इसे निशाकर
असह्य ताप स्वयं ही सहकर
खुले आकाश में यु ही तपकर
राते रोशन करता धरती पर
लगता है सबको अति सुन्दर
न जाने कितने नखत गणों का
यही अकेला स्वामी है
पीत रंग से ढका हुआ है
चकवा जिसका प्रेमी है
न जाने कितने प्रेमियों को
रात भर जगाता है
हर विरही के आँखों में
स्वप्न बनकर छाता है
थोड़े काले धब्बे भी
मान न इसका घटा पाते
अनगिनत सुन्दरियों के चेहरे
चन्द्र उपमा से लजाते
कृष्ण पक्ष की काली रात
कुछ न इसका बीगार पाती
जब आये चांदनी रात
इसकी और उड़े चकवा पाखी
अति पूरा काल से
कवियों का अति प्रिय रहा
न जाने कितने युगों से
यह रात में मिश्री घोल रहा
घटते बढते रहने पर भी
यह न कभी घबराता है
धैर्य धारण करता है और
पूर्ण रूप भी पता है
तभी तो यह निशा पति कहलाता है
फैलाता धरा पर शान्ति अमन
दीखता तब जब छिपे दिवाकर
तभी तो कहते इसे निशाकर
असह्य ताप स्वयं ही सहकर
खुले आकाश में यु ही तपकर
राते रोशन करता धरती पर
लगता है सबको अति सुन्दर
न जाने कितने नखत गणों का
यही अकेला स्वामी है
पीत रंग से ढका हुआ है
चकवा जिसका प्रेमी है
न जाने कितने प्रेमियों को
रात भर जगाता है
हर विरही के आँखों में
स्वप्न बनकर छाता है
थोड़े काले धब्बे भी
मान न इसका घटा पाते
अनगिनत सुन्दरियों के चेहरे
चन्द्र उपमा से लजाते
कृष्ण पक्ष की काली रात
कुछ न इसका बीगार पाती
जब आये चांदनी रात
इसकी और उड़े चकवा पाखी
अति पूरा काल से
कवियों का अति प्रिय रहा
न जाने कितने युगों से
यह रात में मिश्री घोल रहा
घटते बढते रहने पर भी
यह न कभी घबराता है
धैर्य धारण करता है और
पूर्ण रूप भी पता है
तभी तो यह निशा पति कहलाता है
बुधवार, 11 अगस्त 2010
basant
जब जब बसंत आता है
नै उमंगे भी लाता है
पेड़ो पर नै नै कोपले
चारो तरफ की सुन्दर दृश्यावली
मानव मन को भाती है
कोयले भी गाती है नित नए उत्साह से
सरसों भी फूलते है बड़े सुन्दर
आमो के बागो इ मौरे
उन पर काले काले भौरे
जैसे चले आते है दौड़े
प्रकृति सदा मुस्काती रहती
नित नए रूप दिखाती रहती
मानव का मन भी भर जाता
नित नए उत्साह से
बसंत तो है प्रेम की ऋतू
जीर्ण सिर्ण को त्याग कर
प्रकृति करती रूप नविन धारण
प्रकृति सदा मुस्काती रहती
प्रेम सदा बरसाती रहती
ऋतुराज की महिमा अनंत
यह है प्यारा प्यारा बसंत
नै उमंगे भी लाता है
पेड़ो पर नै नै कोपले
चारो तरफ की सुन्दर दृश्यावली
मानव मन को भाती है
कोयले भी गाती है नित नए उत्साह से
सरसों भी फूलते है बड़े सुन्दर
आमो के बागो इ मौरे
उन पर काले काले भौरे
जैसे चले आते है दौड़े
प्रकृति सदा मुस्काती रहती
नित नए रूप दिखाती रहती
मानव का मन भी भर जाता
नित नए उत्साह से
बसंत तो है प्रेम की ऋतू
जीर्ण सिर्ण को त्याग कर
प्रकृति करती रूप नविन धारण
प्रकृति सदा मुस्काती रहती
प्रेम सदा बरसाती रहती
ऋतुराज की महिमा अनंत
यह है प्यारा प्यारा बसंत
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