बुधवार, 14 अप्रैल 2010

भुखमरी

आज इस धरा पर
इक बड़ी बिमारी फैली
मनुष्य है इससे प्रभावित
नाम है इसका भुखमरी

पेट के लिए ही तो
लोअग न जाने क्या के करते है
फिर भी इस धरा पर
करोनो के पेट न भरते है

वे मजबूर है
यूँ ही भूखा जीवन बिताने को
धरा पर इतना कुछ होते हुए भी
आधा पेट खाने को

भूख छीन लेती है
जिन्दगी जीने की शक्ति
न जाने कितने लोगो की
होती है असमय मृत्यु

इससे कुछ सोचने की शक्ति भी
ख़त्म हो चुकी होती ही
न जाने कितनी ललनाये
भूखे पेट सोती ही

मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

नक्सलियों के हमलो पर दिल के उदगार

सानिया शोएब की शादी में उलझा हुआ है देश
इधर नक्सलियों के हमलो में रह जा रहे जवान खेत

सायद हमें आदत सी हो गयी है ,सच को यु छुपाने की
हर इक हमले के बाद बस यूँ ही बद्द्बदाने की

कहने को तो ये अपनो की अपनो से लड़ाई है
पर जाकर कोई उनको देखे जिनके अपनो ने प्राण गवाई है

अगर हम अब भी न चेते तो देर बहुत हो जाएगा
हम यूँ ही देखते रहेंगे और देश टुकड़ो में बात जाएगा

पिट लेता हु अपना सर नेताओं की बाते सुन
उनकी संवेदनाये भी न जाने कहा है गुम

कहा गए वो लोअग जो लगाते है नक्सलियों के लिए मदद की गुहार
क्या उन्हें सुनने नहीं दे रही देशवासियों की करूँ पुकार

हर इक हमले के बाद खून के आंसू रोया हु मै
याकि मानिए कई कई रात चैन न सोया हु मैं

कुछ स्वतंत्र पद

याद उन्हें किया जाता है जिन्हें भूलने का डर हो
उनको नहीं जिनके saath बिताना जिन्दगी का सफ़र ho
आप ने khud को भूलने ki बात बात हमें बताई
पर मैंने hai दिल me आपकी सूरत बसाई
२
मंजिलो को गर हमसफ़र बनाना चाहो
तो मन में असफलता का डर न हो
कार्य अपना करते जाओ बेहिचक ,चाहे
सामने तुम्हारे मुस्किलो का जहा हो
३
भले ही सामने खड़ा हो मुस्किलो का पहार
पर उ ही न माने आप अपनी हार
तईयार हो जाओ उनसे जूझने के लिए
लेके संकल्पों का हथियार
४
मजिल अभी दूर है बहले लोअग कहते रहे
पर aअप के कदम सदा उसी और बढ़ते रहे
मत घबराइये करोनो बाधाओ से
गर चाहते है की ज़माना आपकी दास्ताँ कहे
५
आप भले ही हम पर बेवफाई का इल्जाम लगाए
हम तो अब अब तक आपको भूल न पाए
जीवन भर आपको याद करते रहेंगे
भले ही आप हमें भूल जाए
६
जो जुदाई सह चुके है दर्द वाही जानते है
दुनिया वाले तो इसे कोरी बकवास मानते है
कोई हाले दिल उनसे पूछे ,जिन्होंने ये दर्द झेला है
अपना सब कुछ लुटा प्यार का खे ल खेला है
७
जख्मो को कुरेद कुरेद कर ,मेरा दर्द वो बढ़ाते रहे
अपने गम को छुपा हम सामने मुस्कुराते रहे
पर भला वो क्या जाने मेरे दर्द की गहराइयो को
दिखने को हमसे प्यार के दो बोअल कहे
८
उनके इसक का रंग कुछ चढ़ा इस कदर
उनके सिवा कोई दूजा न आये अब नजर
खुद मिट जाऊंगा या मिटा दूंगा साड़ी दुनिया को
साथ न उनका मुझे मिला अगर
९
जिन्दगी में कुछ करना चाहो तो
हिम्मत कभी न हारो
सफल होने के लिए मन की कमजोरी को मारो
सफलता बनेगी आपकी चेरी ,रास्ता केवल सही विचारो
१०
एक सुनहरी रात को मैंने देखा उनका सपना
चाह कर भी उस सपने को मई न बना सका अपना
उनसे दूर रहना तो जैसे की इक सजा है
jhuth कहते है kavi लोअग की जुदाई में ही असली मजा है
११
हर इक दिन को तुम अपना नया दिन मानो
असफलताओं को ही सफलताओं का मार्ग जानो
गर जान गए निराशा से आशा की राह
निसचय ही पूरी होगी जिन्दगी की हर चाह

रविवार, 11 अप्रैल 2010

हादसा

क्या गलती थी उसकी
हैवानो ने जिंदगी तबाह कर दी
मन की भूख मिटाने के लिए
इक मासूम की जिंदगी बर्बाद कर दी

इसी तरह की बाते
लोअग हर जगह सोचा करते है
और आँखे मुद कर
ऐसी घटनाएं देखा करते है

आज चारो तरफ वो
देखती है सहमी सहमी
ख़त्म हो गयी है जिंदगी उसकी
जब समाज से मिली बेरहमी

दूसरो के दानवपन से
ख़त्म हो गया उसका जीवन
उस एअक हादसे के बाद ही
झुलस गया उसका तन और मन

आज तो उसके जीवन से
सारा रस ही सुख गया
उम्र भर के लिए केवल
दुःख ही दुःख है छुट गया

आज यह दिखावे का समाज
छिनना चाहता उसकी जिन्दगी
गलतिया भले ही हो उनकी
पर मानते है उसे गंदगी

यह कहानी आज केवल
इक ही नहीं है
दुर्भ्याग्य बस आज
चाहू और ही यही है

इस भौतिकवादी समाज ने
आधी आबादी दबा डाली
कलियों के खिलने के पहले ही
उसे बुरी तरह मसल डाली

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

बालश्रम

बालश्रम को रोकने का
अधिनियम पारित हुआ
पर न जाने किन कारणों से
केवल हाथी दात साबित हुआ

आज भी न जाने कितने
देश के कर्णधार माने जाने वाले
असंख्यो बच्चे
सुबह से ही दिन रात जी तोड़ मेहनत करते है

और यही उनका भविष्य भी
बन जाता है
पर पता नहीं हमारे समाज को
कुछ समझ में क्यों न आता है

या शायद कुछ समझ में आता हो
पर उन लड़को के माँ बाप को
इसके सिवा दूजा
शायद ही कोई रास्ता नजर आता हो

मजबूरी बस पेट पालने के लिए ही
शायद पूरा जीवन जीते है
जन्म से लेकर मौत तक वे
केवल श्रम ही करते है

उन बच्चो के अपने सपने
बचपन में ही मिट जाते है
शायद उनके बालाधिकार भी
गुमनामी में गूम होते है

लोअग भूल जाते है की बच्चे ही
होते है कर्णधार धरा के
वे तो सपने देखते है
केवल अपनी रोटी के

पालको की दया पर निर्भर
सहते है शोषण ही शोषण
पर वे रोटी के कारन ही
मजबूरी बस करते धैर्य धारण

पतले पतले पैरो वाले
बड़े निकले पतो वाले
इन गरीब बच्चो के बल पर
यह देश अहम् भरता है
और यह दृश्य हमारे
समाज की विडम्बना को व्यक्त करता है

बुधवार, 31 मार्च 2010

बरसात

नभ में घिर आई काली घटा
छाया प्रकृति में खुशियों का नशा
खेत में फसले लगी लहलहाने
कृषक वर्ग लगे मुस्काने

आया मौसम बरसात का
लाया जीवन का सौगात
दादुर पपीहा लगे बोलने
पीपर पात लगे डोलने

मिटटी की सोंधी महक ने
किसानो को हरसाई
रसदार जामुन के फलो ने
बगिया साड़ी महकायी

स्वाति नछत्र के आने पर
चातक ने भी प्यास बुझाई
बरसात आने पर धरा से
सुस्कता ने ली विदाई

इन काले बादलो ने
वियोगी जनों को कस्ट पहुचाई
बरसात को देख देख कर
प्रेमी जनों ने प्रिय मिलन की आस लगाईं

बरसात के आने से
धरा पर हरियाली छाने से
मेढक के बोल सुनाने से
सुकोमल प्रकृति मुस्काई

पानी की बुँदे गिरती मोती सी
खुशिया मन में आती आंधी सी
धरा को अमृत पान कराने
यह वर्षा ऋतू आई

जल थल को एक कर
उंच नीच का भेद मिटाए
नदियों की धरो में भी
जैसे मस्ती सी छाये

वर्षा ऋतू को मनुष्य
जीवनी शक्ति के रूप में याद करते है
बार बार समय से धरा पर आये यह ऋतू
हम यह इस्वर से फ़रियाद करते है

रविवार, 28 मार्च 2010

आजादी

यह कैसी बेकार आजादी
हम लोगो के जीवन में आई
सुख के जो सपने देखे थे
उसके उलट दुःख की घटा छाई

आजादी के बाद लोगो में
न जाने कितने अरमान जगे रहे
पर वे सब अरमान
रह गए धरे के धरे

लोगो ने सोचा था की
गोरो के कुसासन से मिलेगी अब मुक्ति
अपने देश में चलेगी
केवल हम अपनो की युक्ति

हम होंगे स्वतंत्रत
खुल के बाते करने को
आम जन भी होगा सछम
अपने सासन चलाने को

क्योकि अब तो देश में
लोअक्तंत्र का राज होगा
और आम जन के हाथ में
इस राज का काज होगा

होगी गरीबी दूर अस्प्रिस्यता की मिटेगी खाई
ख़त्म होगा
जाती पात का भेद भी
होंगे हम सब भाई भाई

पर ये सब भाव
आज अधमरे हो गए
हम लोगो के जो सपने थे
वो सपनो में ही खो गए

आज की इस्तिथि हमारी सोअच
के बिलकुल ही उलट है
आज चारो तरफ
भ्रस्त्ताचार अनीति आदि का ही भरा गरल है

जातिगत भेद भाव से
हमारे समाज का मुह कला है
भाई भतीजावाद व् प्रांतवाद का
हुआ बोल बाला है

आज तमाम अफसर भी
खूंखार भेडियो सा गरजते
स्वर्थी नेता गन भी केवल
अपने फायदे की बात करते

आज चारो तरफ एक
आग सी लगी है
जन साधारण के आजादी की
वो प्यास भी बुझी है

इन सब बातो को देख
लोगो के दिल में उदासी छाई
और लगे सोचने की
उन्होंने ये कैसी आजादी पायी

बीत गए ६० साल
आजादी की वर्षगाँठ मनाते मनाते
हम लोग भी सायद उब चुके है
दुःख के आंसू बहाते बहाते

शनिवार, 20 मार्च 2010

हँस दी

आखिर आज हस ही दी
हर एक औरत एक साथ
उनको मिल गया था जो
अपने अधिकारों का साथ
अपने अधिकारों के बल पर
हम बदल देंगी धरा सारी
समवेत स्वर में बोली
मिलकर आज औरते सारी

(राज्य सभा में महिला आरछ्ण विधेयक पास होने पर विशेष )

ध्यान

आखिर प्रलय हो ही गया
जिसकी मिल रही थी चेतावनिया
प्यारी धरती को ले डूबी हम
हम मानवों की नादानिया
जो बचे वो कम्पित मन से
कर रहे थे बस एक ही ध्यान
काश हम लोगो ने इससे बचने का
किया होता पहले कुछ काम

विश्व तापमान में वृद्धि होने पर (विशेष)

सोचु

मुस्कुराती रहु इठलाती रहु
बस एक ही नाम गुनगुनाती रहु
मिलन की आस कुछ ऐसी लगी की
ख्वाबो में भी उनको बुलाती रहु
मेरे उर में आ रही है
बस प्रियतम की याद
सोचु अब मै बिन उनके
कैसे कटेगा ये मधुमास